Guru's AddaGuru's Adda

Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 78

20 verse-groups

  1. Verses 1–4पहले यह गुणवान्‌ है या निर्गुण है, इस प्रकार गुण के सम्बन्ध का विचार कर तदनन्तर गुणीको अप…
  2. Verse 5राजा ने कहा : अरे भूत, तुम कौन हो ? और कहाँ रहते हो ? अपनी देह को दिखलाओ । भँवरी के गुंजन…
  3. Verses 6–8किसी वस्तु में अभिलाषा रखनेवाले लोग अपनी अभिलाषा के विषय पदार्थपर सिंह के समान पूर्ववेग स…
  4. Verse 9राजा के वैसा कहनेपर "राजा ने बहुत उत्तम कहा ।* - ऐसा मन में विचाकर वह उन लोगों के प्रकाश…
  5. Verses 10–19आँखें थी, वह ऐसी काली थी मानों अन्धकार से ही उसकी रचना हुई हो, यक्ष, राक्षस ओर पिशाचो को…
  6. Verse 20वह जले हुए काठ से चिह्नित और जले हुए काठ के समान थी और उसका विशाल शरीर था, वृक्षों के तुल…
  7. Verse 21उसको देखकर वे महाबलशाली राजा ओर मन्त्री पूर्ववत्‌ बिना किसी क्षोभ के खड़े रहे | ऐसी कोई व…
  8. Verses 22–23यदि तुम महावलशालिनी हो, तो छोटे कार्य के लिए इतना कोप करना युक्त नहीं है, यों शाति से समा…
  9. Verse 24हे अबले ! तुम्हारे जैसे हजारों मच्छर हम लोगों की धीरतारूपी ओंधी से तिनके ओर सूखे हुए पत्त…
  10. Verse 25यदि राक्षसी की ओर से प्रश्न हो कि मेरी स्वार्थसिद्धि कैसे होगी 2 तो इस पर कहते है । इस को…
  11. Verse 26कार्य की सिद्धि में सन्देह होने पर भी उक्त अनादि नियम से सिद्ध सामरूप उपाय का त्याग नहीं…
  12. Verses 27–28कहो, तुम्हें किस वस्तु की अभिलाषा है, तुम प्रार्थिनी होकर क्या चाहती हो ? हम लोगों का याच…
  13. Verse 29ये कोई सामान्य पुरुष नहीं है, यह कोई विचित्र चमत्कार है, मेरा अन्तःकरण इनके वचन और मुखदर्…
  14. Verses 30–32वचन, मुखदर्शन आदि से ज्ञानियों के अन्तःकरण परस्पर ऐसे एक हो जाते हैं जैसे कि नदियों के जल…
  15. Verses 33–35इन लोगों ने मेरा अभिप्राय जान लिया और मैंने इनका अभिप्राय जान लिया है । इन लोगों का मुझे…
  16. Verses 36–38हे पापरहित धीर पुरुषों, मुझे बतलाइए कि आप लोग कौन हैं ? निर्मल चित्तवाले ज्ञानी पुरुषोंकी…
  17. Verses 39–40राक्षसी ने कहा : राजन्‌, तुम्हारा मन्त्री दुष्ट है यानी तुम दुष्टमन्त्रीवाले हो । और दुष्…
  18. Verses 41–42प्रभुता और समदृष्टिता राजविद्या से प्राप्त होते हैं, उस राजविद्याको जो नहीं जानता है, वह…
  19. Verse 43एक ही उपाय से मेरे पाप से तुम लोग मुक्त हो सकते हो । जैसे बालक अपनी माता पिताके प्रीतिपात…
  20. Verse 44को सुनो, इन प्रश्नों के उत्तर के लिए ही मैं अत्यन्त अर्थिनी हू, मेरी अभिलाषा को पूर्ण करो…