Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
प्रश्नानिमान्कथय पार्थिव वा च मन्त्रिंस्तत्रार्थिनी भृशमहं परिपूरयार्थम् ।
अङ्गीकृतार्थमददत्क इवास्ति लोके दोषेण संक्षयकरेण न युज्यते यः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
को सुनो, इन प्रश्नों के उत्तर के लिए ही मैं अत्यन्त अर्थिनी हू, मेरी अभिलाषा को पूर्ण
करो - देने के लिए स्वीकृत अर्थ को न देता हुआ कोन पुरुष इस लोक में विनाशकारी दोष
से युक्त नहीं होता ?