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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

मन्त्र्युवाच । महाराक्षसि संरम्भो महात्मा किमयं तव । लघवो ह्यथवा कार्ये लघावप्यतिसंभ्रमाः ॥ २२ ॥ त्यज संरम्भमारम्भो नायं तव विराजते । विषये हि प्रवर्तन्ते धीमन्तः स्वार्थसाधकाः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि तुम महावलशालिनी हो, तो छोटे कार्य के लिए इतना कोप करना युक्त नहीं है, यों शाति से समाधान करने की इच्छा से मन्त्री कहते है । मन्त्री ने कहा : हे महाराक्षसी, यह तुम्हारा अत्यन्त कोप किसलिए है ? भाव यह कि केवल वचनमात्र से मिलनेवाले आहार-लाभ के लिए क्रोध ओर साहस आदि की आवश्यकता नहीं है । अथवा क्षुद्र जीव तुच्छ कार्य के लिए भी अत्यन्त घटाटोप करते हैं यानी तुम यदि लघु हो, तो तुम्हारे क्रोध से हमको किसी तरह का भय नहीं है, यह भाव है । तुम कोप को छोडो, तुम्हारा यह उद्योग उत्तम नहीं है । अपना कार्य सिद्ध करनेवाले बुद्धिमान्‌ पुरुष साम से (शान्ति से) सिद्ध होनेवाले विषय में दण्डका प्रयोग नहीं करते हैं