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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 27–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

कथयाभिमतं किं ते किमर्थयसि चार्थिनी । अर्थी स्वप्नेऽपि नास्माकमप्राप्तार्थः पुरो गतः ॥ २७ ॥ इत्युक्ता सा तदा तेन चिन्तयामास राक्षसी । अहो नु विमलाचारं सत्त्वं पुरुषसिंहयोः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

कहो, तुम्हें किस वस्तु की अभिलाषा है, तुम प्रार्थिनी होकर क्या चाहती हो ? हम लोगों का याचक जन स्वप्न में भी निराश होकर दूसरे के पास नहीं गया हे । मन्त्री के यों कहने पर उस राक्षसी ने सोचा, इन दोनों महापुरुषों का धैर्य ओर बुद्धिबल बड़ा निर्मल है