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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 39–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 39,40

संस्कृत श्लोक

राजा चादौ विवेकेन योजनीयः सुमन्त्रिणा । तेनार्यतामुपायाति यथा राजा तथा प्रजाः ॥ ३९ ॥ समस्तगुणजालानामध्यात्मज्ञानमुत्तमम् । तद्विद्राजा भवेद्राजा तद्विन्मन्त्री च मन्त्रवित् ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

राक्षसी ने कहा : राजन्‌, तुम्हारा मन्त्री दुष्ट है यानी तुम दुष्टमन्त्रीवाले हो । और दुष्टमन्त्रीवाला राजा भविष्णु नहीं होता। अच्छे राजा से युक्त मन्त्री आदरणीय होता है और सन्मन्त्री से युक्त राजा आदरणीय होता है॥ ३ ८॥ योग्य मन्त्रीको चाहिए कि वह राजा को विवेकी बनाये । विवेकसे राजा श्रेष्ठताको प्राप्त होता है, जैसा राजा होता है, वैसी उसकी प्रजा होती है । सम्पूर्ण गुणगणों में से अध्यात्मज्ञान सर्वोत्तम है । उक्त अध्यात्मज्ञान को जाननेवाला राजा प्रशस्त राजा होता है और अध्यात्मज्ञानी मन्त्री मन्त्रविद्‌ (विचार के रहस्य को जाननेवाला) होता है