Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 36–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 36, 37
संस्कृत श्लोक
मन्त्र्युवाच ।
अयं राजा किरातानामस्याहं मन्त्रितां गतः ।
उद्यतौ रात्रिचर्येण त्वादृग्जनविनिग्रहे ॥ ३६ ॥
राज्ञो रात्रिंदिवं धर्मो दुष्टभूतविनिग्रहः ।
स्वधर्मत्यागिनो ये तु ते विनाशानलेन्धनम् ॥ ३७ ॥
राक्षस्युवाच ।
राजंस्त्वमसि दुर्मन्त्री दुर्मन्त्री न नृपो भवेत् ।
सद्रूपस्य भवेन्मन्त्री राजा सन्मन्त्रिणो भवेत् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे पापरहित धीर पुरुषों, मुझे बतलाइए कि आप लोग कौन हैं ?
निर्मल चित्तवाले ज्ञानी पुरुषोंकी, दर्शनसे ही, मैत्री हो जाती है ॥ ३ ५॥ मंत्री ने कहा : हे राक्षसी,
ये किरातों के राजा हैं, मैं इनका मन्त्री हू । हम लोग तुम्हारे सरीखे घातक जीवों को दण्ड देने
के लिए रात्रिचर्या में उद्यत हैं । राजा का रात दिन दुष्टों को दण्ड देना धर्म है। जो दुष्ट अपने
धर्म का परित्याग करते हैं, वे विनाशरूपी अग्नि के इन्धन होते हैं