Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 56
28 verse-groups
- Verses 1–5पचपनवाँ सर्म समाप्त छप्पनवाँ सर्ग राजा विदूरथ का वासनामय यमपुरी मेँ गमन, लीला और सरस्वती…
- Verse 6जैसे प्राणवृत्ति से उपहित संवित् वायु में स्थित सूक्ष्म गन्ध का अनुभव करती हे, वैसे ही द…
- Verse 7वह जीवसंवित् गगनमण्डल में अतिवाहिक प्राणवायु से मिलकर वासना के वशवर्ती होकर आकाश में दूर…
- Verse 8तदुपरान्त उन दोनों स्त्रियों ने जैसे भँवरियाँ वायु में मिले हुए सुगन्धलेश का अनुगमन करती…
- Verse 9तदनन्दर मुहूर्तभर में मरणमूर्छा के शान्त होने पर जैसे वासनामय शरीर से स्वप्न आविर्भाव होत…
- Verses 10–11उसने यम के दूतों को और उनसे ले जाये जा रहे अपने वासनामय शरीर को देखा तथा बन्धुओं के और्ध्…
- Verses 12–14उसके यमपुरी में पहुँचने के पश्चात् यम ने उसके कर्मो पर विचार कर आज्ञा दी कि इसने पापकर्म…
- Verses 15–19तदनन्तर क्षेपणीयन्त्र (एक प्रकार के गुलेल) से गिरे हुए पत्थर के समान आकाशभाग में उसे छोड़…
- Verse 20राजा विदूरथ की पत्नी द्वितीय लीला के जीव को उसकी लड़की ने मार्गप्रदर्शन कराया यह पहले कहा…
- Verses 21–22पूर्व शरीर की वासना के पूर्ण होने के पहले ही बीचमें बलवान् प्रारब्ध से अन्य जन्म की सृष्…
- Verse 23जैसे सजीव वटबीज अपने अन्दर अंकुर का अनुभव करता है, वैसे ही चित्कला जीव भी अपने स्वभावभूत…
- Verses 24–25जैसे अन्य स्थान में स्थित पुरूष दूर देशान्तर में स्थित अपने निधान की (भूमि में गाढे हुए ध…
- Verse 26पहले जो यह कहा था कि जीवने बन्धु ओं के पिण्डप्रदान से उत्पन्न हुए अपने शरीर को देखा, उसे…
- Verse 27श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, बन्धुओं द्वारा पिण्ड चाहे दिया जाय अथवा न दिय…
- Verse 28जैसा चित्त होता है, वैसा ही जन्तु होता है, इसमें “यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत् सनातन…
- Verse 29मुझे मेरे बन्धुबान्धवों ने पिण्ड दिया, इस बुद्धि से जिसे पिण्ड नहीं दिया गया, वह भी पिण्ड…
- Verse 30इन पदार्थो की सत्यता भावना के अनुसार होती है ओर भावना भी अपने कारणभूत पदार्थो से उत्पन्न…
- Verse 31जैसे प्राणी की वासना से (गरुड की उपासना करनेवाले पुरुष की अपने में गरुड़भावना करने से) सर…
- Verse 32वत्स श्रीरामचन्द्रजी, आप अपने मन में यह अटल निश्चय कर लीजिये कि कारणभूत भावना के बिना कभी…
- Verse 33कारण की असत्ता में कार्य क्यो उत्पन्न नहीं होता, इस विषय में कहते हैं। कारण के बिना कार्य…
- Verse 34इस प्रकार शुद्ध चिन्मात्र ही भ्रान्ति से वासना ओर वासनाजन्य जगद्रूपसे भास्रित होता है, यह…
- Verses 35–36"सपिण्डोऽस्मीति संवित्या“ (मैं सपिण्ड हूँ यानी पिण्डग्रदान से युक्त हूँ, इस भावना से) इत्…
- Verses 37–38शास्त्रोक्त देश और काल में शास्त्रोक्त अनुष्ठान से शास्त्रानुसारिणी सुढ़दवासना शास्त्रप्र…
- Verse 39धर्म-दान के प्रतिपादक शास्त्रप्रमाण से यह कल्पना होती है कि प्रेत के अन्तःकरणे उसी समय (ध…
- Verses 40–41यदि देश, काल आदि सहकारी कारणों के बल से धर्म और उसकी वासना आदि का उदय माना जाय, तो सदेव स…
- Verses 42–45आपने जो मेरे प्रति कहा वह अभीष्ट ही है, विरुद्ध नहीं है। “न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न…
- Verses 46–49पूर्ववर्णित प्रणाली से राजा पद्म के नगर में आयी हुई लीला और सरस्वती देवीजी ने राजा पद्म क…
- Verse 50वह महल सम्पूर्ण चन्द्रमा के कलासहित उदय प्रकाशित होने के कारण बाहर बड़ा सुन्दर था, उसने अ…