Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 12–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, verses 12–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 12-14
संस्कृत श्लोक
प्राप्तं वैवस्वतपुरमादिदेश ततो यमः ।
अस्य कर्माण्यशुभ्राणि नैव सन्ति कदाचन ॥ १२ ॥
नित्यमेवावदातानां कर्तायं शुभकर्मणाम् ।
भगवत्याः सरस्वत्या वरेणायं विवर्धितः ॥ १३ ॥
प्राक्तनोऽस्य शवीभूतो देहोऽस्ति कुसुमाम्बरे ।
प्रविशत्वेष तं गत्वा त्यज्यतामिति चेतसा ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके यमपुरी में पहुँचने के पश्चात् यम ने उसके कर्मो पर
विचार कर आज्ञा दी कि इसने पापकर्म कभी किये ही नहीं यानी इसका एक भी पाप कर्म नहीं
है। सदा लोभ आदि दोषों के सम्पर्क से रहित तथा पुण्य कर्मों का अनुष्ठान करनेवाला यह
श्रीसरस्वती देवीजी के वरदान से बढ़ाया गया है यानी इसके पुण्यों की वृद्धि की गई है। इसका
पूर्वजन्म का मुर्दा शरीर फूलों से वेष्टित मण्डपाकाश में है, यह वहाँ जाकर उस शरीर में प्रवेश
करे ओर आप लोग मेरी आज्ञा का अनुसरण करनेवाले चित्त से इसे छोड़ दें