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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । देशकालक्रियाद्रव्यसंपत्त्योदेति भावना । यत्रैवाभ्युदिता सा स्यात्स द्वयोरधिको जयी ॥ ३७ ॥ धर्मदातुः प्रवृत्ता चेद्वासना तत्तया क्रमात् । आपूर्यते प्रेतमतिर्न चेत्प्रेतधियाशुभा ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

शास्त्रोक्त देश और काल में शास्त्रोक्त अनुष्ठान से शास्त्रानुसारिणी सुढ़दवासना शास्त्रप्रमाण से प्रबल है । प्रेतवासना केवल लौकिक होने से दुर्बल है, इसलिए शास्त्र ही वासना की प्रबलता में कारण है, अर्थसत्यता प्रबलता में हेतु नहीं है, यों गूढ अभिप्रायवाले श्रीवसिष्ठजी समाधान करते हैं। श्रीरामजी ! देश, काल, कर्म और द्रव्य की सम्पत्ति से भावना उत्पन्न होती है, वह जिस फलरूप विषय में उत्पन्न होती है, दोनों में से वही विषय विजयी होता है