Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
यथा जीवद्वपुर्बीजमङ्कुरं हृदि पश्यति ।
स्वभावभूतं चिदणुस्त्रैलोक्यनिचयं तथा ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सजीव वटबीज अपने अन्दर अंकुर का अनुभव करता है,
वैसे ही चित्कला जीव भी अपने स्वभावभूत त्रैलोक्य का (तीनों लोकों का) अपने अन्दर
अनुभव करता हे