Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तस्य स्ववासनान्तःस्थशवस्य किल राघव ।
तत्सर्वं हृद्गतं कस्मान्नासौ प्राप्नोति तद्गृहम् ॥ २१ ॥
भ्रान्तिमात्रमसंख्येयं जगज्जीवकणोदरे ।
वटधानातरुमिव स्थितं को वा न पश्यति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व शरीर की वासना के पूर्ण होने के पहले ही बीचमें बलवान् प्रारब्ध से अन्य जन्म की
सृष्टि हो गई, भोग से उस प्रारब्ध का क्षय होने पर पूर्व वासना के उद्भव से जैसे आया था वैसे
मार्ग की प्रतीति होती है, अतः मार्गदर्शक की अपेक्षा नहीं है ऐसा उत्तर देते हैं।
श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे राघव, उस जीवकी वासना के अन्दर शवरूप पद्मशरीर में
अहंभाव था, अतएव उसके हृदय में वह सब मार्ग आदि स्फुरित हो जाता है, इसलिए वह उस
घर को कैसे प्राप्त नहीं होगा जैसे वट का बीज मिट्टी, जल आदि अंकुरोत्पत्ति की सामग्री
मिलने पर स्वयं अंकुररूप से उत्पन्न हो रहे वटवृक्ष का अपने भीतर ही अनुभव करता हे, वैसे
ही सूक्ष्म जीवोपाधिभूत अन्तःकरण के अन्दर आविर्भूत वासनाओं के रूप से स्थित भ्रान्तिरूप
असंख्य जगत् को कौन नहीं देखेगा ? उसको दिखाने के लिए किसी परिदर्शक की आवश्यकता
नहीं है, यह भाव है