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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

यथा वासनया जन्तोर्विषमप्यमृतायते । असत्यः सत्यतामेति पदार्थो भावनात्तथा ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे प्राणी की वासना से (गरुड की उपासना करनेवाले पुरुष की अपने में गरुड़भावना करने से) सर्पका विष भी अमृत बन जाता है यानी पच जाता है, वैसे ही असत्य पदार्थ भी, सत्यरूप से भावना करने से, सत्य हो जाता है, यानी काँटा चुभनेपर यदि यह भ्रम हो जाय कि मुझे साँपने काट लिया, तो असत्य भी सर्पदंश मरण आदि कार्य कर डालता है, यह भाव है