Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 40–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 40,41
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
देशकालादिना ब्रह्मन्वासना समुदेति चेत् ।
तन्महाकल्पसर्गादौ देशकालादयः कुतः ॥ ४० ॥
कारणे समुदेतीदं तैस्तदा सहकारिभिः ।
सहकारिकारणानामभावे वासना कुतः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि देश, काल आदि सहकारी कारणों के बल से धर्म और उसकी वासना आदि का उदय
माना जाय, तो सदेव समोम्येदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयम्“ (हे सोम्य, यह पहले एक और
अद्वितीय सत् ही था) इस श्रुति से आदि सृष्टि में देश, काल आदि सहकारी कारण तो थे ही
नहीं, उनके अभाव में वासना की उत्पत्ति कैसे होगी ? वासना की उत्पत्ति न होने से वासनामय
जगत् की उत्पत्ति ही नहीं होगी। ऐसी परिस्थिति में तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय“ (उसने संकल्प
किया कि मैं प्रजारूप से बहुत होऊँ) इत्यादि श्रुतियों से विरोध होगा, इस आशय से
श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन् देश, काल आदि से यदि वासना उत्पन्न होती है, तो
महाकल्प के अनन्तर की सृष्टि में देश, काल आदि कहाँ थे ? सहकारी कारणों से वासनारूप
कारण के रहने पर ही यह जगत् उत्पन्न होता है । महाकल्प के बाद होनेवाली सृष्टि के आदि
में देश, काल आदि सहकारी कारण तो थे नहीं, फिर वासना होगी कहाँसे