Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 27–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 27,28
संस्कृत श्लोक
त्यक्तदेहैकराज्यत्वं लीलाविलसितान्वितम् ।
ज्ञात्वा प्रज्ञप्तिवृत्तान्तं लीलायास्तु विजृम्भितम् ॥ २७ ॥
आत्मोदन्तं बभूवासावुह्यमान इवार्णवे ।
उवाचात्मनि संसारे बत मायेयमातता ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा ने लीला के विलास (कर्तव्य) के साथ-साथ शरीर ओर एकच्छत्र राज्य के त्याग को,
कभी पहले अनुभवपथ में आरूढ न हुए भी देवी सरस्वती के वृत्तान्त को, लीला की अत्युन्नति
को ओर अपने वृत्तान्त को जाना । उसे जानकर राजा समुद्र में गोते लगाता हुआ सा विस्मय
में पड गया । उसने अपने मन में कहा, बड़े खेद की बात है कि संसार में यह माया फैलायी गई
है ।