Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 5, 6
संस्कृत श्लोक
आसनद्वयविश्रान्तं स ददर्शाप्सरोद्वयम् ।
मेरुशृङ्गद्वये चन्द्रबिम्बद्वयमिवोदितम् ॥ ५ ॥
निमेषमिव संचिन्त्य स विस्मितमना नृपः ।
उत्तस्थौ शयनाच्छेषादिव चक्रगदाधरः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उसने दो आसनो पर बैठी हुई मेरु के दो
शिखरो पर उदित हुए दो चन्द्रविम्बों की नाई, दो अप्सराओं को देखा । राजा को बड़ा विस्मय
हुआ, एक क्षणभर अपने मन में विचारकर जैसे शेषशय्या से चक्रपाणि भगवान् गदाधर उठते
हैँ, वैसे ही वह शयन से उठा