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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 22–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, verses 22–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 22-25

संस्कृत श्लोक

देव्यौ दीर्घतपःक्लेशशतैर्दुष्प्रापदर्शने । इत्ययं वसुधाधीशो विदूरथ इति श्रुतः ॥ २२ ॥ अद्य युष्मत्प्रसादेन परां पावनतां गतः । इत्युक्त्वा संस्थिते तूष्णीं मन्त्रिण्यवनिपे तथा ॥ २३ ॥ कृताञ्जलौ नतमुखे बद्धपद्मासनेऽवनौ । राजन्स्मर विवेकेन पूर्वजातिमिति स्वयम् ॥ २४ ॥ वदन्ती मूर्ध्नि पस्पर्श तं करेण सरस्वती । अथ हार्दं तमो मायापद्मस्य क्षयमाययौ ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे देवियों बड़े भारी तप आदि सैकड़ों क्लेशो से भी आपके दर्शन मिलना कठिन हैं। इस प्रकार दर्शनप्रदानरूप आपके प्रसाद से ये महाराज श्रीमान्‌ विदूरथ आज अत्यन्त पवित्र हो गये हैं, यह कहकर जब मन्त्री चुप हो गये ओर राजा नीचे मुखकर भूमि में पद्मासन बाँधकर चुपचाप बैठे थे तब “राजन्‌, आप विवेक से स्वयं अपने पूर्वजन्म का स्मरण कीजिए" यह कह रही सरस्वती ने उनके मस्तक पर हाथ से स्पर्श किया । देवी के स्पर्श करने के अनन्तर पद्म का हृदयान्धकार यानी माया विनष्ट हो गई