Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 35–44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, verses 35–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 35-44
संस्कृत श्लोक
तत्रैव तस्य भूपीठं तस्मिंश्च किल मण्डपे ।
तस्यैव च गृहस्यान्तरिदं संसारमण्डलम् ॥ ३५ ॥
तन्नैवेदं तव गृहं स्थितमारम्भमन्थरम् ।
तत्रैव चेतसि तव निर्मलाकाशनिर्मले ॥ ३६ ॥
प्रतिभामागतमिदं व्यवहारभ्रमाततम् ।
यथेदं नाम मे जन्म तथेक्ष्वाकुकुलं मम ॥ ३७ ॥
एवंनामान एते मे पुराभूवन्पितामहाः ।
जातोऽहमभवं बालो दशवर्षस्य मे पिता ॥ ३८ ॥
परिव्राड्विपिनं यात इह राज्येऽभिषिच्य माम् ।
ततो दिग्विजयं कृत्वा कृत्वा राज्यमकण्टकम् ॥ ३९ ॥
अमीभिर्मन्त्रिभिः पौरैः पालयामि वसुन्धराम् ।
यज्ञक्रियाक्रमवतो धर्मे पालयतः प्रजाः ॥ ४० ॥
वयसः समतीतानि मम वर्षाणि सप्ततिः ।
इदं परबलं प्राप्तं मम दारुणविग्रहः ॥ ४१ ॥
युद्धं कृत्वेदमायातो गृहमस्मिन्यथास्थितम् ।
इमे देव्यौ गृहे प्राप्ते ममैते पूजयाम्यहम् ॥ ४२ ॥
पूजिता हि प्रयच्छन्ति देवताः स्वसमीहितम् ।
ममेयमेतयोरेका ज्ञानं जातिस्मृतिप्रदम् ॥ ४३ ॥
इह दत्तवती देवी भाब्जस्येव विकासनम् ।
इदानीं कृतकृत्योऽस्मि जातोऽस्मि गतसंशयः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी ब्राह्मणगृह में उसी मण्डप में उसका (तुम्हारे जीव का) भूतल है उसी घर के अन्दर
यह परिदृश्यमान पाद्मसंसारमण्डल हे वहीं पर तुम्हारा यह महा-समृद्धिशाली घर स्थित है,
वहीं पर निर्मल आकाशके तुल्य निर्मल तुम्हारे चित्तमें व्यवहार भ्रम का विस्तार करनेवाला यह
दृश्य प्रपंच प्रतीति को प्राप्त हुआ है व्यवहारभ्रम परम्परा की विस्तारकता का, जो कि सबको
अनुभूत है, उल्लेख करते हैं । जैसे कि यह मेरा जन्म हे, मेरा इक्ष्वाकु कुल है, ये इस नाम के
मेरे पिता, पितामह आदि पहले हुए थे । मैं उत्पन्न हुआ, बालक रहा, जब मैं दस वर्ष का था,
मेरे पिता यहाँ पर राज्य में मेरा अभिषेक कर संन्यासी हो बन को चले गये । तदुपरान्त दिग्विजय
करके राज्य को कण्टकशून्य (शत्रुविहीन) बनाकर इन मन्त्रियों और नागरिकों के साथ मैं
पृथिवी का पालन करता हूँ, यज्ञक्रिया करते और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते-करते मेरी
अवस्था के सत्तर वर्ष व्यतीत हो गये हें । इस समय शत्रुसेना ने मेरे ऊपर चढ़ाई कर रक्खी हे ।
उसके साथ मेरा भीषणयुद्ध चल रहा है, युद्ध करके मैं घर आया हूँ, इस घर में यथापूर्व स्थित
हुआ हू । ये देवियाँ मेरे घर में प्रकट हुई हैं, मैं इनका पूजन करता हू । यह निश्चित बात है कि
पूजित देवता मनोकामना पूरी करते है । इन दोनों में से एक देवी ने जैसे सूर्य की प्रभा कमल को
विकास देती है वैसे ही मुझे यहाँ पर ऐसा ज्ञान दिया जो पूर्व जन्मस्मृतिप्रद है, इस समय मैं
कृतकृत्य हो गया हूँ, मेरे सन्देह कट गये हैं