Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 55–56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, verses 55–56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 55,56
संस्कृत श्लोक
पश्यसीवैतदखिलं न च पश्यसि किंचन ।
सर्वात्मकतया नित्यं प्रकचस्यात्मनात्मनि ॥ ५५ ॥
महामणिरिवोदार आलोक इव भास्वरः ।
वस्तुतस्तु न भूपीठमिदं न च भवानयम् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
दृश्य के मिथ्या होने पर दृश्यसंवलित चिदाभासरूप दृश्यदर्शन भी मिथ्या ही है, यों
विषयशून्य केवल चिन्मात्र का शेष है, इस अभिप्राय से देवी कहती है ।
तुम इस समस्त प्रपंच को देखते से हो, वास्तव में कुछ भी नहीं देखते, क्योकि विषयी
जीव ही नहीं है, तब देखोगे क्या ? किन्तु तुम ही निर्मल महामणि के समान और भास्कर सूर्य
आदि के समान अपने स्वरूप में अपने से नित्यसर्वात्मभाव से प्रदीप्त होते हो । वस्तुतः न तो
यह भूतल सत् है, न यह तुम ( प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा विदूरथदेह) सत् हो, न ये पर्वत हैं, न ये
ग्राम हैं, और न ये तुम्हारे परिजन, शत्रु ही सत् हैं, न हम लोग ही सत् हैं