Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, Verses 15–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 41, verses 15–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 15-20
संस्कृत श्लोक
आसीदिक्ष्वाकुवंशोत्थो राजा राजीवलोचनः ।
श्रीमान्कुन्दरथो नाम दोश्छायाच्छादितावनिः ॥ १५ ॥
तस्याभूदिन्दुवदनः पुत्रो भद्ररथाभिधः ।
तस्य विश्वरथः पुत्रस्तस्य पुत्रो बृहद्रथः ॥ १६ ॥
तस्य सिन्धुरथः पुत्रस्तस्य शैलरथः सुतः ।
तस्य कामरथः पुत्रस्तस्य पुत्रो महारथः ॥ १७ ॥
तस्य विष्णुरथः पुत्रस्तस्य पुत्रो नभोरथः ।
अयमस्मत्प्रभुस्तस्य पुत्रः पूर्णामलाकृतिः ॥ १८ ॥
अमृतापूरितजनः क्षीरोदस्येव चन्द्रमाः ।
महद्भिः पुण्यसंभारैर्विदूरथ इति श्रुतः ॥ १९ ॥
जातो मातुः सुमित्राया गौर्या गुह इवापरः ।
पितास्य दशवर्षस्य दत्त्वा राज्यं वनं गतः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
पहले ईक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा
श्रीमान् कुन्दरथ थे, “उनके कमल के सदृश विशालनेत्र थे और उन्होंने अपने बाहुओं की
छाया से आच्छादित की नाईं शत्रुओं और दरिद्रता से जनित दुःख के निवारण द्वारा पृथिवी का
पालन किया । उनका चन्द्रमा के सदुश सुन्दर मुख वाला भद्ररथ नाम का लड़का हुआ। उसका
विश्वरथ नाम का लड़का हुआ । विश्वरथ का बृहद्रथ नाम का लड़का हुआ । उसका
सिन्धुरथनामक लड़का हुआ। सिन्धुरथ के लड़के का नाम शैलरथ पड़ा । शैलरथ से कामरथ
नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ | कामरथ से महारथ पैदा हुआ । महारथ का विष्णुरथ लड़का हुआ ।
उसका लड़का नभोरथ हुआ । ये हमारे स्वामी राजा नभोरथ के महान् पुण्यपुंजों से समुद्रसे
चन्द्रमा की नाई उत्पन्न हुए हैं, पूर्ण चन्द्रमा के समान इनकी निर्मल आकृति है, जैसे चन्द्रमा
अपनी अमृतस्त्राविणी किरणों से लोगों को आह्लादित करते है, वैसे ही इन्होंने अमृततुल्य
अपने स्नेह, मधुरता, उदारता, दया आदि गुणगणों से लोगों को तृप्त कर दिया है। ये माता
सुमित्रा की कोख से उनके महान् पुण्यपुंजों से, श्रीपार्वतीजी से गुह की नाई, उत्पन्न हुए हैं।
इनका शुभ नाम विदूरथ है । इनके विरक्त ओर मोक्षेच्छु पिताश्री, जबये दस ही वर्ष के थे,
इन्हे राज्य देकर तप करने के लिए वन में चले गये थे