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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 26

पवीसर्वौ सर्ग समाप्त छब्बीसवाँ सर्ग अपने घर मेँ अपने पुत्र आदि आत्मीयं को देखकर और उनका विलाप सुनकर उनके ऊपर लीला का अनुग्रह तथा जगत्‌ के तत्त्व का वर्णन ।

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  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, वे दोनों ललनाएँ राजा पद्य जिसमें रहता था, उस ब्रह्म…
  2. Verses 2–5कारण सबके मुँह पर घनी उदासी छाई थी, अतएव सबके मुँह उस कमल के तुल्य थे, जिसकी पँखुड़ियाँ झ…
  3. Verse 6वह घर गृहपति के वियोग से हतप्रभ हो गया था, उसकी मुखकान्ति करुणा से (शोक को बढानेवाले एक प…
  4. Verses 7–19वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अब सुन्दर लीला निर्मल ज्ञान का चिरकालतक अभ्यास करने से देवताओं की न…
  5. Verse 20ज्येष्ठशर्मा आदि ने कहा : हे वन-देवियों, आप लोगों की जय हो, मालूम होता है कि आप दोनों हमा…
  6. Verses 21–22ज्येष्ठशर्मा के यह कहने के बाद उन वन-देवियों ने बड़े आदर से पूछा आप लोग अपना दुःख किये, ज…
  7. Verses 23–24ज्येष्ठशर्मा आदि ने कहा : हे देवियों, इस स्थान में अतिथिसत्कार करनेवाले ब्राह्मणदम्पती रह…
  8. Verses 25–42पूर्ण: पूर्ण जगत्पश्येत्‌ कायुकः कामुकं जगत्‌। आतोऽप्यार्तिंमयं विश्वं लुब्धो लुब्धं स्वच…
  9. Verse 43श्रीरामचन्द्रजी को यह शंका हुई कि लीला तो सत्यसंकल्प थी, अतएव उसने पहले के (ब्राह्मण और ब…
  10. Verse 44लीला के पुत्र के घर में आगमन प्रपंच मिथ्या है” इसकी परीक्षा के लिए हुआ था, पुत्रस्नेहप्रय…
  11. Verse 45जैसे बालक को भ्रम से पुरुष का ज्ञान न होने से, वेताल प्रतीत होता है, वैसे ही भ्रमवश पृथिव…
  12. Verses 46–55जैसे स्वप्नावस्था में पृथिवी आदिरूप से प्रतीत पदार्थ यह स्वप्न है, ऐसा ज्ञान होने पर क्षण…
  13. Verse 56यदि लीला का अपने पुत्र आदि पर स्नेह नहीं था, तो उसने उनके सिरपर हाथ कैसे केरा ? इस शंका प…
  14. Verse 57पहले जैसे ही पदार्थो का चिन्तन करता हे, वैसे ही पदार्थ शीघ्र आभासित होते हैं । बोध स्वयं…