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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, Verses 25–42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, verses 25–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 25-42

संस्कृत श्लोक

पक्षिणो गृहमारुह्य विक्षिपन्तः प्रतिक्षणम् । देहं शून्ये मृतं भक्त्या शोचन्ति मधुरैः स्वरैः ॥ २५ ॥ गुहागुरुगुरारावप्रलापलपनाकुलः । सरित्स्थूलाश्रुधाराभिः परिरोदिति पर्वतः ॥ २६ ॥ निर्जराक्रन्दकारिण्यो मुक्ताम्बरपयोधराः । तप्तनिःश्वासविध्वस्ताः परं कार्श्यमिता दिशः ॥ २७ ॥ क्षतविक्षतसर्वाङ्गः करुणाक्रन्दकर्कशः । उपवासरतो ग्रामो दीनो मृतिपरः स्थितः ॥ २८ ॥ दिवसं प्रति वृक्षाणामवश्यायाश्रुबिन्दवः । गुच्छलोचनकोशेभ्यस्तापोष्णानि पतन्त्यधः ॥ २९ ॥ प्रशान्तजनसंचारा रथ्या क्षारविधूसरा । विधवाविगतानन्दा संशून्यहृदया स्थिता ॥ ३० ॥ कोकिलालिप्रलापिन्यो वृष्टिबाष्पहता लताः । उष्णोष्णश्वसना देहं घन्ति पल्लवपाणिभिः ॥ ३१ ॥ आत्मानं शतधा कर्तुं बृहच्छ्वभ्रशिलातले । निर्झराः प्रपतन्त्येते तापतप्तशरीरकाः ॥ ३२ ॥ निःशङ्कया गतश्रीका मूका विलुलिताशयाः । अन्धेन तमसा पूर्णा गृहा गहनतां गताः ॥ ३३ ॥ उद्यानपुष्पखण्डेभ्यो रुदद्भ्यो भ्रमरारवैः । पूतिगन्धो विनिर्याति स्वामोदापरनामकः ॥ ३४ ॥ चैत्रद्रुमविलासिन्यो विरसाः प्रतिवासरम् । लताः कृशा विलीयन्ते सकुचद्गुच्छलोचनाः ॥ ३५ ॥ प्रक्षेप्तुमम्बुधौ देहं प्रवृत्ता गन्तुमाकुलाः । कुल्याः कलकलालोलं दोलयन्त्यस्तनुं भुवि ॥ ३६ ॥ अशङ्कमशकापातस्पन्दमप्यतिचापलम् । कलयन्त्यः स्थिता वाप्यो निस्पन्दानन्दमात्मनि ॥ ३७ ॥ गायत्किन्नरगन्धर्वविद्याधरसुराङ्गनम् । नूनमद्य नभो जातमस्मत्ताताभ्यलंकृतम् ॥ ३८ ॥ तद्देव्यौ क्रियतां तावदस्माकं शोकनाशनम् । महतां दर्शनं नाम न कदाचन निष्फलम् ॥ ३९ ॥ इत्युक्तवन्तं सा पुत्रं मूर्ध्नि पस्पर्श पाणिना । पल्लवेनानता नम्रं मूलग्रन्थिमिवाब्जिनी ॥ ४० ॥ तस्याः स्पर्शेन तेनासौ दुःखदौर्भाग्यसंकटम् । जहौ प्रावृड्घनासङ्गाद्ग्रीष्मतापमिवाचलः ॥ ४१ ॥ सर्वो गृहजनः सोऽथ तयोर्देव्योर्विलोकनात् । लक्ष्मीवान्दुःखनिर्मुक्तो बभूवामृतपो यथा ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्ण: पूर्ण जगत्पश्येत्‌ कायुकः कामुकं जगत्‌। आतोऽप्यार्तिंमयं विश्वं लुब्धो लुब्धं स्वचित्तवत्‌ । (पूर्ण पुरुष अपनी चित्तवृत्ति के अनुसार सम्पूर्ण जगत्‌ को पूर्ण देखता है, कामी पुरुष अपनी चित्तवृत्ति के अनुसार सारे जगत्‌ को कामी देखता है, दुःखी पुरुष अपनी चित्तवृत्ति के अनुसार सम्पूर्ण जगत्‌ को दुःखमय देखता है ओर लोभी पुरुष अपनी चित्तवृत्ति के अनुसार सम्पूर्ण जगत्‌ को लोभी देखता है ।) इस न्याय के अनुसार उन्होने कहा : हे देवियों, देखिये, पक्षी घर के ऊपर बैठकर प्रतिक्षण आकाश में अपनी देह को पटकते हुए मृतक के प्रति भक्ति से मधुर शब्दों द्वारा शोक प्रकट करते हैं । सब पर्वत दीर्घ गुर-गुर शब्दरूपी विलाप से पूर्ण गुहारूपी मुखो से युक्त ओर व्याकुल होकर नदीरूपी आँसूकी धाराओं से रोते हैं दिक्पाल देवताओं के आलापरूप रोदन करनेवाली, तपे हुए निःश्वास वायु से मलिन एवं जिनके मेघो ने (स्तनों ने) आकाश का (वर्त्र का) त्यागकर दिया है, ऐसी दिशारूपी अंगनाएँ अत्यन्त कृशता को प्राप्त हुई हे । ग्रामवासी सम्पूर्ण लोगों के सर्वाग मारे शोक के भूमि में लोटने, छाती पीटने आदि से क्षतविक्षत हो गये हैं, चारों ओर करूण रस का स्रोत बहानेवाले मुक्त कण्ठ रुदन से सब जर्जरित हो रहे हैं, कोई भी भोजन ग्रहण नहीं करता, सभी दीन-हीन दशा में हैं और सभी मरने के लिए प्रस्तुत हैं । प्रतिदिन वृक्षों के गुच्छरूपी लोचनकोशों से ओसरूपी अश्चुविन्दु शोक से (धूप से) गर्म होकर नीचे गिरते है । जिनमें जनों का संचार शान्त है एवं धूलि से मलिन सडक आनन्दरहित एवं शून्य हृदय विधवा के समान हँ । कोयल और भ्रमरो के शब्द से विलाप करनेवाली, वृष्टिरूपी बाष्प से आहत और अत्यन्त उष्ण निःश्वासवाली लताएँ पल्लवरूपी हाथों से अपने शरीर को पीटती हैँ । ये झरने शोक से अति सन्तप्त होकर बड़े भारी गर्त के शिलातल में अपने सौ टुकड़े करने के लिए गिर रहे हैं । गाढ अन्धकार (शोक) से व्याप्त, हर्ष की चर्चा से शून्य एवं जिसके अन्दर स्थित वर्तन आदि सामग्री तहस-नहस हे ऐसे घर निरस्सन्देह गतश्री (शोभाविहीन) होकर अरण्यरूप में परिणत हो गये हैं । भ्रमरो के गुंजार से रोदन कर रहे उद्यान के फूलों से सुन्दर आमोदनामक दुर्गन्ध निकल रही हे । भाव यह कि उद्यानों के पुष्पों से यद्यपि सुन्दर सौरभ निकल रही है फिर भी नासिका को दुःखदायी होने से शोकार्तं पुरुष दुर्गन्धि कह कर उसकी निन्दा करते हैं । बसन्त ऋतु के वृक्षों को सुशोभित करनेवाली लताएँ दिन प्रतिदिन विरस ओर कृश होकर गुच्छरूपी लोचनं को संकुचित करती हुई शीर्ण-विशीर्ण हो रही हैं । नहर और नदियाँ सागर में अपने शरीर को वाने के लिए गमनाकुल होकर पृथिवी मेँ अपने शरीर को कलकलनिनादपूर्वक दोलायमान कर रही है । ये बावड़ियाँ पहले लोगों के स्थान, जल मरना आदि व्यवहार से अत्यन्त चपलता को धारण करती थी, किन्तु अब इनमें मच्छर के गिरने से होनेवाले स्पन्दकी भी संभावना नहीं है, यों निस्पन्दभाव से स्वस्वरूप में समाधिनिष्ठ हुई जेसी स्थित है । हे देवियों, जिस प्रदेश मे किन्नरिर्यो, गन्धर्व, विद्याधर ओर देवताओं की अंगनाएँ गायन कर रही हैं, उस स्वर्ग प्रदेश को आज हमारे माता ओर पिता ने अलंकृत किया है, इसमें कुछ सन्देह नहीं हे । हे देवियों, हमारे शोक का विनाश कीजिये । महानुभावो का दर्शन कभी निष्फल नहीं होता, इसलिए हमें आशा है कि आप अवश्य हमारे शोक का विनाश करोगी । जैसे जल सूख जाने पर कमलिनी नम्र होकर अपने पल्लव से मूलग्रन्थि का (जडका) स्पर्श करती है, वैसे ही पुत्र के ऐसा कहने के पश्चात्‌ लीला ने अपने हाथ से उसके मस्तक का स्पर्श किया जैसे वर्षा ऋतु के मेघो के संसर्ग से पर्वत ग्रीष्म ऋ्तु के सन्ताप का त्याग करता हे, वैसे ही लीला के उस स्पर्श से ज्येष्ठशर्मा ने दु-खदुभग्यरूपी विपत्ति का त्याग किया । उन देवियों के दर्शन से घर भर के सब लोग देवताओं की नाई दुःखरहित ओर लक्ष्मीवान्‌ हो गये