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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, Verses 46–55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, verses 46–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 46-55

संस्कृत श्लोक

यथा पृथ्व्यादिना भातमपृथ्व्यादि भवेत्क्षणात् । स्वप्ने स्वप्नपरिज्ञानात्तथा जाग्रत्यपि स्फुटम् ॥ ४६ ॥ पृथ्व्यादि खतया बुद्धं खमित्येवानुभूयते । तथाहि क्षुब्धधातूनां कुड्येषु ख इवोद्यमः ॥ ४७ ॥ स्वप्ने नगरमुर्वीं वा शून्यं खातं च बुध्यते । स्वप्राङ्गना च कुरुते शून्याप्यर्थक्रियां नृणाम् ॥ ४८ ॥ खं पृथ्व्यादितया बुद्धं पृथ्व्यादि भवति क्षणात् । मूर्च्छायां परलोकोऽपि प्रत्यक्षमनुभूयते ॥ ४९ ॥ बालो व्योमैव वेतालं म्रियमाणोऽम्बरे वनम् । केशोण्ड्रकं खमन्यस्तु खमन्यो वेत्ति मौक्तिकम् ॥ ५० ॥ त्रस्तक्षीबार्धनिद्राश्च नौयानाश्च सदैव स्ये । वेतालवनवृक्षादि पश्यन्त्यनुभवन्ति च ॥ ५१ ॥ यथाभावितमेतेषां पदार्थानामतो वपुः । अभ्यासजनितं भाति नास्त्येकं परमार्थतः ॥ ५२ ॥ लीलया तु यथावस्तु बुद्ध्वा पृथ्व्यादिनास्तिता । आकाशमेव संवित्त्या भाति भ्रान्तितयोदितम् ॥ ५३ ॥ ब्रह्मात्मैकचिदाकाशमात्रबोधवतो मुनेः । पुत्रमित्रकलत्राणि कथं कानि कदा कुतः ॥ ५४ ॥ दृश्यमादावनुत्पन्नं यच्च भात्यजमेव तत् । सम्यग्ज्ञानवतामेव रागद्वेषदृशो कृतः ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्नावस्था में पृथिवी आदिरूप से प्रतीत पदार्थ यह स्वप्न है, ऐसा ज्ञान होने पर क्षणभर में अपृथिवी आदि रूप हो जाते हैं, वैसे ही जाग्रदवस्था में भी स्पष्ट है । भाव यह कि भ्रमवश जाग्रदवस्था में पृथिवी आदिरूप से प्रतीत पदार्थ ज्ञान होने के उपरान्त तुरन्त अपृथिवी आदिरूप हो जाते हैं । पृथिवी आदि यदि आकाशरूप से जाने जाय, तो ये आकाश ही हैं, ऐसा अनुभव होता है। देखिये न ! विक्षिप्त लोगों को दरवाजे के सदश प्रतीत होनेवाली स्फटिककी दीवारों पर शून्य में जैसा उद्यम दिखाई देता है यानी उन्हें दरवाजे समझकर वे घुसने की चेष्टा करते हैं | स्वप्नावस्था में नगर शून्यरूप से प्रतीत होता है और सम पृथिवी गर्तरूप से प्रतीत होती है। स्वप्न की अंगना यद्यपि शून्य है, सत्‌ नहीं है, तथापि वह मनुष्यों की पादसंवाहन आदि क्रिया करती है। यदि आकाश की पृथिवी आदिरूप से प्रतीति हो गई, तो आकाश क्षणभर में पृथिवी आदि हो जाता हे । मूर्च्छावस्था में किसी किसी को परलोक भी प्रत्यक्ष दिखाई देता हे । बालक आकाश को ही वेताल, मर रहा पुरुष आकाश में वन, अन्य पुरुष उसे कुण्डलाकार केशों का गोला रूप और दूसरा पुरूष उसको मोतियों का समुदाय रूप देखता हे । भयभीत, पागल, आधा सोया ओर आधा जागा हुआ पुरूष तथा नौका द्वारा चलनेवाले पुरुष सदा ही आकाश में वेताल, वन ओर वृक्ष आदि देखते हैं और तत्प्रयुक्त पलायन आदि कार्य का अनुभव करते हैं । इससे यह सिद्ध हुआ कि इन पदार्थो का अपनी अपनी भावना के अनुसार अभ्यास से उत्पन्न हुआ शरीर है, परमार्थतः कोई एक (नियत) शरीर नहीं है । लीला ने तो भ्रान्तिरूप से (मिथ्याप्रपंचरूप से) उदित हुआ आकाश ही दृश्य पदार्थरूप से प्रतीत होता हे, यो पृथिवी आदि की नास्तिता (अभाव) रूप यथार्थ वस्तु का ज्ञान प्राप्त कर लिया था । ब्रह्मरूप एक चिदाकाशमात्र के ज्ञान से सम्पन्न मुनि के पुत्र, मित्र, कलत्र आदि कौन, कैसे, कहाँ से ओर कब होगे ? दृश्य पहले ही उत्पन्न नहीं हुआ, जो प्रतीत होता है, वह अनादि अनन्त परब्रह्म ही है, इस प्रकार यथार्थ ज्ञानवाले लोगों की राग-द्वेषदृष्टियाँ कैसे हो सकती हे ?