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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, Verses 7–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, verses 7–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 7-19

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ सा निर्मलज्ञानचिराभ्यासेन सुन्दरी । संपन्ना सत्यसंकल्पा सत्यकामा च देववत् ॥ ७ ॥ चिन्तयामास मामेते देवीं चेमां स्वबन्धवः । पश्यन्तु तावत्सामान्यललनारूपधारणीम् ॥ ८ ॥ ततो गृहजनस्तत्र स ददर्शाङ्गनाद्वयम् । लक्ष्मीगौर्योर्युगमिव समुद्भासितमन्दिरम् ॥ ९ ॥ आपादविविधाम्लानमालावसनसुन्दरम् । वसन्तलक्ष्म्योर्युगलमिवामोदितकाननम् ॥ १० ॥ सर्वौषधिवनग्रामं पूरयन्त्यौ रसायनैः । शीतलाह्लादसुखदं चन्द्रद्वयमिवोदितम् ॥ ११ ॥ लम्बालकलतालोललोचनालिविलोकनैः । किरत्कुवलयोन्मिश्रमालतीकुसुमोत्करान् ॥ १२ ॥ द्रुतहेमरसापूरसरित्सरणहारिणा । देहप्रभाप्रवाहेण कनकीकृतकाननम् ॥ १३ ॥ सहजाया वपुर्लक्ष्म्या लीलादोलाविलासिनः । त एते च तरङ्गाढ्या निजलावण्यवारिधेः ॥ १४ ॥ विलोलबाहुलतिकायुगेनारुणपाणिना । किरन्नवनवं हैमं कल्पवृक्षलतावनम् ॥ १५ ॥ पादैरमृदिताम्लानपुष्पकोमलपल्लवैः । स्थलाब्जदलमालाभैरस्पृशद्भूतलं पुनः ॥ १६ ॥ तालीतमालखण्डानां शुष्काणां शुचिशोचिषाम् । आलोकनामृतासेकैर्जनयद्बालपल्लवान् ॥ १७ ॥ नमोऽस्तु वनदेवीभ्यामित्युक्त्वा कुसुमाञ्जलिम् । तत्याज ज्येष्ठशर्माथ सार्धं गृहजनेन सः ॥ १८ ॥ पपात पादयोर्गेहे तयोर्वै कुसुमाञ्जलिः । प्रालेयसीकरासारः पद्मिन्या इव पद्मयोः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अब सुन्दर लीला निर्मल ज्ञान का चिरकालतक अभ्यास करने से देवताओं की नाई सत्यसंकल्प ओर सत्यमनोरथ हो गई थी । उसने संकल्प किया कि मुझे और देवी सरस्वती को ये मेरे बन्धुबान्धव साधारण स्त्री के वेष में देखें । उसके यों संकल्प करने के उपरान्त घर के लोगों ने वहाँ पर लक्ष्मी और पार्वती के तुल्य दो अंगनाओं को देखा । उन्होंने अपनी कान्ति से उस घर को जगमगा रक्खा था, सिरसे लेकर पैर तक भाँति-भाँति की अनेक अम्लान (न कुम्हलाई हुई ) मालाओं के परिवेष्टन से उनकी सहज सुन्दरता कहीं अधिक बढी चढ़ी थी, अतएव दो वसन्तलक्षिमियों के सदुश उन्होने अपने सहज सौरभ से वन और उपवनों को सुगन्धित कर दिया था । ये दो ललनाएँ क्या थी अपनी चाँदनीरूप सुधा से सम्पूर्ण औषधियों को पूर्ण कर रहे, शीतल तथा आह्लादसुख देनेवाले उदित हुए दो चन्द्रमा थे । वे दोनों लटक रहे अलकरूपी लताओं की संनिधि में चंचल होने के कारण भ्रमररूप से परिणत लोचनो द्वारा विलोकनं से नील कमलों से मिश्रित मालतीपुष्पों के (५?) पुंजों को मानों बरसा रही थी । पिघलाये गये सुवर्ण के रस को बहानेवाली नदी के वेग के सदुश मनोहर अपने शरीर की कान्ति के प्रवाह से उन्होने आसपास के बनों को सुवर्णमय बना दिया था। वे दोनों ललनाएँ क्या थी, शरीर की प्राकृतिक (स्वाभाविक) शोभारूपी लक्ष्मीकी क्रीडा के लिए बनाये गये झूले के समान विलास करनेवाले अपने सौन्दर्यरूपी समुद्र की श्रेष्ठ तरंगें थी कमल की नाई लाल हाथों से युक्त चंचल दो भुजलताओं से नूतन नूतन स्वर्णमय कल्पवृक्षलताओं के बन की सृष्टि कर रही थी । भाव यह कि उन दोनों में प्रत्येक भुजलताओं ओर उनके अग्रभाग में स्थित लाल हाथों के हिलने-डुलने के कारण प्रतिक्षण विन्यासभेद से पहले कल्पित वन की अपेक्षा नूतन कल्पवृक्षलतावन का निर्मण कर रही थी उनके चरण क्या थे, अमृदित (न मसले हुए) ओर अम्लान (न कुम्हलाये हुए) फूल और कोमल पल्लव थे ओर स्थलकमल की पैँखुरियों की माला थी । एसे कोमल और लाल चरणों से वे भूमितल का स्पर्शं नहीं करती थी । वे अपने दुष्टिपातरूप अमृत के संक से सूखे हुए अतएव सफेद रंग के म्‌ कटाक्षो की नील से मिश्रित शुभ्र छबि होती है, अतएव उनकी नील कमलों से मिश्रित मालती के पुष्पोँ के रूप से उत्प्रेक्षा की गई है । ताल ओर तमाल के वृक्षों के खण्डो में नूतन नूतन पल्‍लवों को पैदा कर रही थी | तदनन्तर ज्येष्ठशर्मा ने घर के अन्यान्य जनों के साथ “वनदेवियों के लिए नमस्कार” कहकर पुष्पांजलि छोडी । घर में उनके पैरों पर पुष्पांजलि ऐसे गिरी जैसे कमल की लता के कमलों पर हिमजल के सीकरों (छोटे छोटे बिन्दुओं) की वृष्टि गिरती है