Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
ज्येष्ठशर्मादय ऊचुः ।
देव्यावभवतां स्निग्धाविह ब्राह्मणदम्पती ।
सर्वातिथी कुलकरौ स्तम्भाभूतौ द्विजस्थितेः ॥ २३ ॥
तावद्य गृहमुत्सृज्य सपुत्रपशुबान्धवम् ।
स्वर्गं गतौ नः पितरौ तेन शून्यं जगत्त्रयम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्येष्ठशर्मा आदि
ने कहा : हे देवियों, इस स्थान में अतिथिसत्कार करनेवाले ब्राह्मणदम्पती रहते थे, उनका
आपस में बड़ा स्नेह था, वे द्विजातियों की मर्यादा के स्तम्भ के समान आधार थे और पुत्रपौत्र
आदि सन्तति के जनक थे । वे हमारे माता-पिता इस समय पुत्र, इष्ट-मित्र और पशुओं के
सहित घर का त्यागकर स्वर्ग में चले गये हैं । इसी कारण हमें यह सारा जगत् शून्य दिखलाई
देता है