Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
बुद्धः पृथ्व्यादिबोधेन येन पृथ्व्यादिसङ्घकः ।
तस्य पिण्डात्मतां धत्ते व्योमैवान्यस्य केवलम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
लीला के पुत्र के घर में आगमन प्रपंच मिथ्या है” इसकी परीक्षा के लिए हुआ था,
पुत्रस्नेहप्रयुक्त तो हुआ नहीं था । पुत्र आदि संसार में मिथ्यात्व ज्ञान होने पर पुत्रस्नेह कर्टँ
रहा, अतः तत्वज्ञान के पश्चात् मूलाविद्या के बाध के अनन्तर वर्तमान शरीर से अतिरिक्त
भौतिक शरीर धारण करने का कोड हेतु नहीं था । इसलिए लीलाने पूर्व शरीर धारण नहीं
किया, यो उपपत्ति सहित उत्तर देने के लिए श्रीवसिष्ठजी भूमिका बोधिते है।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जिस अज्ञानी पुरुष ने मिथ्या पृथिवी आदि का संघातरूप
शरीर पृथिवी आदि के बोध से सत्य जान लिया, उसकी दृष्टि में वस्तुतः केवल अद्वितीय
चिदाकाश ही भ्रान्ति से पिण्डरूपता को धारण करता हे । तत्त्वज्ञ पुरुष की दृष्टि मेँ तो उसका
हेतु अज्ञान न होने से केवल अद्वितीय चिदाकाश ही स्थित रहता है