Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, Verses 2–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, verses 2–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 2-5
संस्कृत श्लोक
ततो ददृशतुः सद्म स्वमेवं सिद्धयोषितौ ।
अदृश्ये एव लोकस्य मण्डपं ब्राह्मणास्पदम् ॥ २ ॥
चिन्ताविधुरदासीकं बाष्पक्लिन्नाङ्गनामुखम् ।
विध्वस्तप्रायवदनं शीर्णपर्णाम्बुजोपमम् ॥ ३ ॥
नष्टोत्सवपुरप्रायमगस्त्यात्तमिवार्णवम् ।
ग्रीष्मदग्धमिवोद्यानं विद्युद्दग्धमिव द्रुमम् ॥ ४ ॥
वातच्छिन्नमिवाम्भोदं हिमदग्धमिवाम्बुजम् ।
अल्पस्नेहदशं दीपमिवालोकनभेदनम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
कारण सबके मुँह पर घनी उदासी छाई थी, अतएव सबके मुँह उस कमल के तुल्य थे, जिसकी
पँखुड़ियाँ झड़ गई हों । ब्राह्मण के आस्पदभूत उस ब्रह्माण्ड के प्रायः सभी नगर उत्सवशून्य
थे, अतएव वह महर्षि अगस्त्यजी द्वारा पिये गये समुद्र के समान, ग्रीष्म ऋतु से मुर्झाकर जर्जर
हुए उद्यान की नाई ओर बिजली गिरने से जले हुए वृक्ष के तुल्य आँखों को चीरता और वायु से
छिन्न भिन्न हुए मेघ के समान तुषारपात से जले हुए कमल के समान एवं उस दीप के समान
जिसका कि तेल और वत्ती चुक गई हो, अदर्शनीय था