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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 112

22 verse-groups

  1. Verse 1जैसे-जैसे प्रकर्षं से मन तीव्र वेग से युक्त होता है उस पदार्थ में उसी वेग से तत्‌-तत्‌ अभ…
  2. Verse 2हे सौम्य, जल के बुदबुदे के समान यह मन का तीव्र वेग उपेक्षा करने से स्वभावतः उत्पन्न होता…
  3. Verse 3“स्वभावतः ऐसा जो कहा है, उसका उपपादन करते है । जैसे बर्फ का शीतलता रूप है ओर काजल का कालि…
  4. Verse 4श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, अत्यन्त चंचल इस मन के तीव्र वेग का मुख्य कारण वेग का यान…
  5. Verse 5श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस संसार में कहीं पर भी च चलता से हीन मन दिखा…
  6. Verses 6–7जो यह जगत्‌ कारण मायासंवलित चैतन्य में स्थित चंचल क्रियाशक्ति हे, उसीको आप मन रूप से परिण…
  7. Verse 8जो मन चंचलता रहित है, वह मृतक मन कहा जाता है, वही तप और शास्त्र का सिद्धान्तरूप मोक्ष कहा…
  8. Verses 9–10मन के केवल विनाशमात्र से दुःख की शान्ति प्राप्त होती है ओर मन के संकल्पनमात्र से परम दुःख…
  9. Verse 11हे श्रीरामचन्द्रजी, मन की जो चंचलता है, वह अविद्या नाम से कही जाती हे । वासनापद नामक उस अ…
  10. Verse 12अविद्या ओर वासनारूप उस चित्तसत्ता के बाह्य विषयों के अनुसन्धान त्याग के विलीन होने पर निर…
  11. Verse 13इस प्रकार वक्तव्य विषय के उपयोगीरूप से मन की चाचल्यधर्मता का समर्थन कर वास्तविक और अवास्त…
  12. Verse 14जडता के अनुसन्धान से बिगड़ा हुआ चित्त बद्धमूल हुई जाङ्यात्मकता से दृढाभ्यासवश जडता को प्र…
  13. Verse 15विवेक के अनुसन्धान से बद्धमूल हुई चिदंशात्मता से मन दृढ़ाभ्यासवश चिन्मात्रता को प्राप्त ह…
  14. Verse 16पौरुष प्रयत्न से, चाहे वह शास्त्रीय हो, चाहे स्वाभाविक, जिसी पद में मन लगाया जाता है, उस…
  15. Verse 17फिर पुरुषप्रयत्न का अवलम्बन कर, चित्त को चित्त से आक्रान्त कर, शोक रहित पद को पाकर निःशंक…
  16. Verse 18हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार की भावना से डूबा हुआ मन यदि मन से ही जबरदस्ती नहीं उबारा जाता ह…
  17. Verses 19–20हे श्रीरामचन्द्रजी, आपके मन का भली-भाँति निग्रह करने में आपका मन ही समर्थ हे । भला, जो स्…
  18. Verse 21परम बन्धन जालरूप मन को अपने मन से ही काट कर जिसने अपनी आत्मा को नहीं छुड़ाया, उसकी मुक्ति…
  19. Verse 22बाह्य पदार्थों का मनन ही जिसका नाम है, ऐसी हृदय को वासित करनेवाली जो जो वासना उदित होती ह…
  20. Verses 23–25वासना के त्याग में क्रम दिखलाते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, भोग्यपदार्थो की वासना का त्याग…
  21. Verse 26वह वेद्य का अवेदन पुरुष के प्रयत्न से होता है, ऐसा कहतें हैं। वह वेद्य का अवेदन पुरुष के…
  22. Verse 27आपके मन में जो-जो विषय ओर उनके उपाय अभीष्ट हैं, उनको आप अवास्तविक जानकर, बीज के मुख से नि…