Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
या योदेति मनोनाम्नी वासना वासितान्तरा ।
तां तां परिहरेत्प्राज्ञस्ततोऽविद्याक्षयो भवेत् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य पदार्थों का मनन ही जिसका नाम है, ऐसी हृदय को वासित करनेवाली जो जो वासना
उदित होती है, विद्वान् पुरुष उस-उस वासना का मिथ्यात्व के अनुसन्धान से त्याग करे ।
तदनन्तर जैसे उष्णता के क्षीण होने पर अग्नि शान्त हो जाती है वैसे ही वासना का क्षय होने
पर मन के साथ अविद्या का क्षय हो जाता है