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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

यत्तत्सदसतोर्मध्यं यन्मध्यं चित्त्वजाड्ययोः । तन्मनः प्रोच्यते राम द्वयोर्दोलायिताकृति ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार वक्तव्य विषय के उपयोगीरूप से मन की चाचल्यधर्मता का समर्थन कर वास्तविक और अवास्तविकरूप द्विस्वरूपता को, अवास्तवाशकी हेयता दिखलाने के लिए और वास्तविकरूप की प्रतिष्ठा के विनाश के वारण के लिए, कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, सत्‌ ओर असत्‌ का जो मध्य है ओर चित्त्त और जाड्य का जो मध्य है, वह दोनों मेँ दोलायमान स्थितिवाला मन कहा जाता है