Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
भवभावनया मग्नं मनसैव न चेन्मनः ।
बलादुत्तार्यते राम तदुपायोऽस्ति नेतरः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार की भावना से डूबा हुआ मन यदि मन से ही
जबरदस्ती नहीं उबारा जाता है, तो उसको उबारने का उससे अन्य उपाय नहीं है