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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verses 23–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 23-25

संस्कृत श्लोक

भोगौघवासनां त्यक्त्वा त्यज त्वं भेदवासनाम् । भावाभावौ ततस्त्यक्त्वा निर्विकल्पःसुखीभव ॥ २३ ॥ अभावनं भावनायास्त्वेतावान्वासनाक्षयः । एष एव मनोनाशस्त्वविद्यानाश उच्यते ॥ २४ ॥ यद्यत्संवेद्यते किंचित्तत्रासंवेदनं परम् । असंवित्तिस्तु निर्वाणं दुःखं संवेदनाद्भवेत् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

वासना के त्याग में क्रम दिखलाते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, भोग्यपदार्थो की वासना का त्याग कर आप भेदवासना का त्याग कीजिये । तदनन्तर चित्त ओर चेत्य का त्यागकर विकल्प रहित होकर सुखी होइए | भावना की भावना न करना ही वासनाक्षय है वही मनोनाश और अविद्यानाश कहा जाता है । अर्थात्‌ जिस अविद्या के आवरण से पूर्णतया अनुभव नहीं होता, उसका तत्त्वसाक्षात्कार से त्याग कर सुखी होडये । साक्षात्‌ अथवा चित्त द्वारा साक्षी से जिस किसी का ज्ञान होता है वहाँ पर संवेद्यता का असंवेदन ही उत्कृष्ट मनोनाशरूप निर्वाण है, यह संक्षिप्त अर्थ है, ऐसे कहते हैं : जो कुछ जाना जाता है उसमें जो परम असंवेदन है, वह असंवेदन ही निर्वाण सुख है और संवेदन से दुःख होता हे