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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

यैषा हि चञ्चला स्पन्दशक्तिश्चित्तत्वसंस्थिता । तां विद्धि मानसीं शक्तिं जगदाडम्बरात्मिकाम् ॥ ६ ॥ स्पन्दास्पन्दादृते वायोर्यथा सत्तैव नोह्यते । तथा न चित्तसत्तास्ति चञ्चलस्पन्दनादृते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जो यह जगत्‌ कारण मायासंवलित चैतन्य में स्थित चंचल क्रियाशक्ति हे, उसीको आप मन रूप से परिणत हुई जगदाडम्बररूप शक्ति जानिये । जैसे स्पन्दन ओर अस्पन्द के बिना वायु के अस्तित्व का अनुमान नहीं होता वैसे ही चंचल स्पन्द के बिना चित्त का अस्तित्व नहीं हे