Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
रागादयो ये मनसीप्सितास्ते बुद्ध्वेह तांस्तांस्त्वमवस्तुभूतान् ।
त्यक्त्वा तदास्याङ्कुरमस्तबीजं मा हर्षशोकं समुपैहि तृप्तः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
आपके मन में
जो-जो विषय ओर उनके उपाय अभीष्ट हैं, उनको आप अवास्तविक जानकर, बीज के मुख
से निकल रहे अंकुरों के तुल्य राग आदि जिसके मुख से निकल रहे हैं, ऐसे मन का भी अज्ञान
और वासनाबीजों के साथ त्याग कर, परिपूर्ण आत्मा के अनुभव से तृप्त होकर हर्ष और शोक
को प्राप्त न होइये