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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verses 19–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

मन एव समर्थं वो मनसो दृढनिग्रहे । अराजा कः समर्थः स्याद्राज्ञो राघव निग्रहे ॥ १९ ॥ तृष्णाग्राहगृहीतानां संसारार्णवरंहसि । आवर्तैरुह्यमानानां दूरे स्वं मन एव नौः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, आपके मन का भली-भाँति निग्रह करने में आपका मन ही समर्थ हे । भला, जो स्वयं राजा नहीं है, वह राजा के निग्रह में कैसे समर्थ हो सकता है ? जो लोग संसाररूपी सागर के वेग में तृष्णारूपी ग्राह से ग्रस्त हैं और आवर्तो से दूर बहाये जा रहे हैं, उन लोगों के लिए अपना मन ही नौका है