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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 108

एक सौ सातवाँ सर्ग समाप्त एक सौ आठतवाँ सर्ग राजा के चण्डालो की उस बस्ती में बहुत वर्षो तक निवास करते समय अनावृष्टि से उत्पन्न दुर्भिक्ष से देश की दुर्दशा का वर्णन |

14 verse-groups

  1. Verse 1राजा ने कहा : हे सभासद्वृन्द, तदनन्तर क्रमशः समय बीतने पर मेरी आयु वृद्धावस्थासे जर्जरित…
  2. Verse 2जैसे वायु से प्रेरित जीर्ण-शीर्ण पत्ते उड़ते हैं वैसे ही कर्मरूपी वायु से प्रेरित सुखयुक्…
  3. Verse 3जैसे युद्ध में वाणो के समूह लगातार आते ओर जाते हैँ वैसे ही सुखदुःख, लडाई - झगड़ा, अकरणीय…
  4. Verse 4मेरा चित्त कल्लोलों से भरे हुए समुद्र के समान भ्रान्त हो गया था, मैं सदा विकल्पों की कल्प…
  5. Verses 5–9चिन्ताओं से व्याप्त चल रहे चक्र में आरूढ होने से मेरे भ्रान्त हो जाने पर और कालरूपी सागर…
  6. Verses 10–11मेघ समुह बरसते न थे, देखते ही नष्ट हो जाते थे। यह भी मालूम नहीं, वे कहाँ रहते थे, कपड़े स…
  7. Verses 12–13अनवसर में उत्पन्न हुआ दुर्भिक्ष बड़ा भीषण हुआ । उसमें वनाग्नि उद्दाम गति से फैली थी । सम्…
  8. Verses 14–19उस दुर्भिक्षकाल में प्रतीत हो रहे मृगतृष्णा के जल में भैंसों का यूथ नहा रहा था । जंगल का…
  9. Verse 20गुफाओं में हमें कोई निगल न जाय इस आशंका से एक-एक करके घूम रहे सिंहो से उसकी भीषणता कहीं अ…
  10. Verses 21–22के घन घटाटोप से वह दुर्भिक्ष काल आवर्तं से ओर वनवायु से युक्त था । सभी जगहों में चटचट शब्…
  11. Verse 23जिन झाड़ियों में वनाग्नि से अजगर जल गये थे, उनसे उठे हुए धुएँ से, जो उनके अधिक फलने-फूलने…
  12. Verses 24–25उस दुर्भिक्ष मेँ चारों ओर उद्दाम हाहाकार मचा था, वनाग्नि से उडी हुए भस्म से बिना दण्ड के…
  13. Verses 26–28उस दुर्भिक्ष में लोग नीले पत्ते ओर लताओं की आशंका से धुएँ की निविड छवि को पीते थे आकाश मे…
  14. Verses 29–30जो विन्ध्याचल का प्रदेश पहले बड़ा मनोहर था, वह इस प्रकार के प्राणि-विनाशकारी दुर्भिक्ष को…