Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verses 5–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, verses 5–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 5-9
संस्कृत श्लोक
चलच्चिन्ताचितं चक्रमारूढे भ्रान्त आत्मनि ।
प्रोह्यमाने तृण इव सावर्तं कालसागरे ॥ ५ ॥
विन्ध्योर्वीवनकीटस्य ग्रासैकशरणस्य मे ।
द्विबाहोर्गर्दभस्यात्र क्षीण इत्थं समागणे ॥ ६ ॥
विस्मृते मम भूपत्वे शवस्येव महाजवे ।
चाण्डालत्वे स्थिरीभूते पक्षच्छिन्न इवाचले ॥ ७ ॥
संसारमिव कल्पान्तो दावाग्निरिव काननम् ।
सागरोर्मिस्तटमिव शुष्कवृक्षमिवाशनिः ॥ ८ ॥
अकाण्डे मरणोड्डीनं चण्डचण्डालमण्डलम् ।
निरन्नतृणपत्राम्बु विन्ध्यकच्छं तदाययौ ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
चिन्ताओं से व्याप्त चल रहे चक्र में आरूढ होने से मेरे भ्रान्त हो जाने पर
और कालरूपी सागर में भौंरियों के साथ बहाये जा रहे तृण के तुल्य किसी अवलम्बन के बिना
स्थित होने पर विन्ध्याचल की भूमि के वन के कीड़े और एकमात्र उदर भरना ही जिसका मुख्य
काम है, ऐसे दो बाहुवाले गर्दभरूप मेरे इस प्रकार वहाँ पर अनेक वर्ष बीते | मैं शव की नाई
अपनी भूपताको भूल चुका था । जिसके पंख कट गये हो ऐसे पर्वत के समान बड़ी वेगवाली
चाण्डालता पूर्णरूप से मुझमें स्थिर हो चुकी थी । जैसे प्रलयकाल संसारको तहस-नहस कर
डालता है, जैसे वनाग्नि जंगल को राख कर देती है, जैसे सागर की लहर तट को मटियामेट
कर डालती है, जैसे वज्र सूखे वृक्ष को जला डालता है, वैसे ही अनवसर मेँ ही जिसमें लोगों
का परलोकगमन होता है ऐसा दुर्भिक्ष क्रोधी चण्डालों की मण्डली से परिपूर्ण अन्न, तृण, पत्ते
और जल के अभाव से युक्त विन्धाचल के जलप्राय प्रदेश में आया