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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 12, 13

संस्कृत श्लोक

अकाण्डमभवद्भीममुद्दामदवपावकम् । शोषिताशेषगहनं भस्मशेषतृणोलपम् ॥ १२ ॥ पांसुधूसरसर्वाङ्गं क्षुधिताशेषमानवम् । निरन्नतृणपानीयं देशाद्युद्दावमण्डलम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

अनवसर में उत्पन्न हुआ दुर्भिक्ष बड़ा भीषण हुआ । उसमें वनाग्नि उद्दाम गति से फैली थी । सम्पूर्ण वन सुखाये गये थे तृण ओर लताओं की भस्म ही शेष रह गये थे । सबके अंग धूलि से धूसरित हो गये थे। सब मानव मारे भूख के व्याकुल थे । उस दुर्भिक्ष में अन्न, तृण और पानी का कहीं नाम न था। सब नगर और ग्राम उसमें उत्कृष्ट अरण्य बन गये थे