Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verses 14–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, verses 14–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 14-19
संस्कृत श्लोक
कचन्मरुमरीच्यम्बुमज्जन्महिषमण्डलम् ।
वातोत्थसीकरव्यूहापरिवाहवनाम्बरम् ॥ १४ ॥
पानीयशब्दमात्रैकश्रवणोत्कनरव्रजम् ।
आतपाततिसंशोषसीदत्सकलमानवम् ॥ १५ ॥
पत्रग्रसनसंरब्धक्षुधितोत्थितजीवितम् ।
स्वाङ्गचर्वणसंरम्भलुठद्दशनमण्डलम् ॥ १६ ॥
मांसशङ्कानिगीर्णोग्रखदिराग्निकणोत्करम् ।
मण्डकासारसंग्रस्तवनपाषाणखण्डकम् ॥ १७ ॥
अन्योन्यभूतसंसक्तमातृपुत्रपितृव्रजम् ।
गृध्रोदररटत्सारनिगीर्णवरसारिकम् ॥ १८ ॥
परस्पराङ्गविच्छेदरक्तसिक्तधरातलम् ।
हरिग्रसनसंरब्धमत्तक्षुधितवारणम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
उस दुर्भिक्षकाल में
प्रतीत हो रहे मृगतृष्णा के जल में भैंसों का यूथ नहा रहा था । जंगल का आकाश वायु से उड़ाये
गये जलकणों को भी धारण नहीं करता था। "पानी" शब्दमात्र के श्रवण से लोगों के झुण्ड के
झुण्ड उत्कण्ठित होते थे । सूर्य के ताप के विस्तार से उत्पन्न हुए शोषसे सब मनुष्य दुःखी हो
रहे थे। घास-पत्ती खाने के उद्योग से अत्यन्त क्षुभित हुए लोगों का उस दुर्भिक्ष में जीवन चला
गया था। अपने शरीर को चबाने की अभिलाषा से दाँत परस्पर एक-दूसरे को काटते थे। यह
मांस है, ऐसी शंका से खैर के उग्र अग्नि-कणों के समूह को लोग निगल गये थे । मण्डक की
(एक प्रकार के पकवान की) भ्रान्ति से नि:सार वन के पत्थरों के टुकड़ों को भी लोग निगल गये
थे । माता, पुत्र, पिता आदि परस्पर के स्नेह से दुःखी होकर प्राणों के भय से लिपटे थे ।
मांसाहारी पक्षियों के पेट में पूरी निगली गयी सुन्दर सारिकाएँ शब्द करती थी । परस्पर अंगों के
काटने से सम्पूर्ण धरातल रुधिर से सिक्त था मदोन्मत्त ओर क्षुभित हाथी शेरों को निगलने के
लिए सन्नद्ध थे