Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
विकल्पकल्पनावर्तवर्तिनि द्विजगे जडे ।
समुद्र इव कल्लोलभरे भ्रमितचेतसि ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरा चित्त कल्लोलों से भरे हुए समुद्र के समान भ्रान्त हो गया था,
मैं सदा विकल्पों की कल्पनारूपी भँवर में पडा रहता था, जैसे पक्षी आकाश में किसी अवलम्बन
के विना उड़ता हे वैसे ही में किसी अवलम्बन के बिना आकाश मेँ चलता था ओर बिलकुल
जड़ हो गया था