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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verses 29–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

सदकाण्डस्फुटद्देशं प्राप्य तच्छुष्ककोटरम् । द्वादशार्काग्निदग्धस्य जगतोऽनुकृतिं ययौ ॥ २९ ॥ ज्वलदनलजटालवृक्षखण्डप्रसरमरुत्प्रसरावनुन्नलोकः । ज्वलनतपनभास्करात्मजानां रमणगृहानुकृतिं जगाम देशः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जो विन्ध्याचल का प्रदेश पहले बड़ा मनोहर था, वह इस प्रकार के प्राणि-विनाशकारी दुर्भिक्ष को पाकर, अनवसर मेँ जिसमें देश नष्ट हो रहे है, शुष्क कोटरवाला होकर प्रलयकाल में उगे हुए बारह सूर्यो की अग्नि से जले हुए जगत्‌ की तुल्यता को प्राप्त हुआ । वह देश, जहाँ पर धधक रही अग्नि से जटायुक्त हुए वृक्षों में बह रही हवा के संचार से लोग बहुत पीडित थे, अग्नि, सूर्य ओर सूर्यपुत्र शनैश्चर की क्रीडाभूमिरूपी घर की तुलना को प्राप्त हुआ