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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verses 24–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

उद्दामरवमुद्भान्तभस्मनाऽस्तम्भमण्डलम् । साक्रन्दनरदाराग्रदीनार्भककृतारवम् ॥ २४ ॥ संभ्रान्तपुरुषव्यूहदन्तकृत्तमहाशवम् । मांसगन्धजवग्रस्तरक्तारक्तनिजाङ्गुलि ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

उस दुर्भिक्ष मेँ चारों ओर उद्दाम हाहाकार मचा था, वनाग्नि से उडी हुए भस्म से बिना दण्ड के छाते तने हुए थे, मारे भूख के रो रहे नर-नारियों के आगे दीन-हीन बालक रो -चिल्ला रहे थे, संभ्रान्त पुरुष दाँतों से बड़े-बड़े शवों के मांस को काट रहे थे, मांस के छोटे-छोटे टुकड़ों को बड़े वेग से निगलने के कारण लोग खून से तर अपनी अंगुलियों को निगल रहे थे