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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verses 26–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, verses 26–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 26-28

संस्कृत श्लोक

नीलपत्रलताशङ्कापीतधूमघनच्छवि । भ्रमद्गृध्रनिगीर्णोग्रनभोभ्रान्तोल्मुकामिषम् ॥ २६ ॥ इतरेतरभिन्नाङ्गलोकविद्रवणाकुलम् । ज्वलिताग्निटणत्कारविदीर्णहृदयोदरम् ॥ २७ ॥ गर्तमारुतक्राङ्कारभीमदावाग्निवल्गनम् । भीताजगरफूत्कारपतदङ्गारपादपम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

उस दुर्भिक्ष में लोग नीले पत्ते ओर लताओं की आशंका से धुएँ की निविड छवि को पीते थे आकाश में घूम रहे गीध आकाश में उड रहे अंगार रूपी मांस खण्ड को निगल रहे थे यानी आकाश में अगारे इधर-उधर उड रहे थे, उन्हें यह मांस पिण्ड है, यह समझकर गीध निगलते थे । परस्पर एक दूसरे के अंग को काटनेवाले लोगों के पलायन से वहाँ बड़ी व्याकुलता हो रही थी, जोर से धधकती हुई अग्नि की भड़भड़ाहट से लोगों के हृदय और पेट फट रहे थे, गहरे गं में प्रवेश कर रहे वायु के झनकार के समान भीषण वनाग्नि की लपटें धधक रही थी, भयभीत अजगरं की फुफकार से वहाँ वृक्षों पर अंगार उड़ रहे थे