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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 101

22 verse-groups

  1. Verse 1पूर्वोक्त अर्थ मे बालकाख्यायिका की अवतारणा करते हुए श्रीवसिष्टजी उपसंहार करते हैं । हे सु…
  2. Verse 2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, किसी युक्तायुक्तविचारशून्य बालक ने अपनी धाय स…
  3. Verse 3महामते, उस बालक के मनोविनोद के लिए धाय ने सरल और कोमल पदों से युक्त आख्यायिका कही
  4. Verses 4–8थे । उनमें से दो उत्पन्न ही नहीं हुए ओर एकमा के गर्भमें भी स्थित नहीं हुआ । किसी समय, जब…
  5. Verses 9–12खूब तपी हुई मार्ग की बालू से उनके चरणकमल जल गये, अतएव यूथसे अलग हुए मृगो की नाई हा तात !…
  6. Verse 13वे बहुत थके थे, अतएव एक वृक्ष के नीचे उन्होंने ऐसे विश्राम लिया जैसे कि स्वर्ग में पारिजा…
  7. Verses 14–16अमृत के तुल्य सुस्वादु फल खाकर, उनका रस पीकर ओर गुलुच्छ नाम की लताके बौरों से माला पिरोकर…
  8. Verses 17–19जो नदी अत्यन्त सूखी थी, उसमें उन्होने सूर्य की धूप से पीडित लोगों की तरह बड़े प्रेम से एस…
  9. Verse 20उस नगर में ऊपर तो पताकाएँ व्याप्त थी ओर नीचे कमलके तालाब भरे हुए थे । नीले आकाश के सदृश स…
  10. Verse 21उस नगर में उन्होने तीन रमणीय उत्तम भवन देखे, वे मणि ओर सुवर्ण के घर हिमालय पर्वत के शिखरो…
  11. Verse 22उनमें दो भवन तो बने ही न थे, एक बिना दीवार का था । दीवाररहित सुन्दर भवन में वे तीनों पुरु…
  12. Verses 23–24उक्त भवन में शीघ्र प्रवेशकर ओर बैठ कर विहार कर रहे सुन्दर मुख-कमलवाले उन राजकुमारों को तप…
  13. Verses 25–28बहुत-सा भोजन करनेवाले उन राजकुमारों ने उस बटलोही में निनानवे ओर एक कम सौ द्रोण (एक द्रोण…
  14. Verse 29हे अनघ वत्स, यह बड़ी सुन्दर आख्यायिका मैंने तुमसे कही है । इसे तुम हृदयंगम करो । इससे तुम…
  15. Verse 30हे श्रीरामचन्द्रजी, धाय ने यह सुन्दर बालकाख्यायिका कही है, इस सुन्दर आख्यायिका से बालक को…
  16. Verses 31–33हे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, मैंने आपके लिए यह बालकाख्यायिका चित्ताख्यान के अनन्तर प्रवृत ह…
  17. Verse 34हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, विकल्परूपी जालों से परिपूर्ण यह प्रातिभासिक संसार रचना बंध, म…
  18. Verse 35किच, यह द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ, दिशाएँ आदि सभी आत्मा के स्वप्न के समा…
  19. Verse 36जैसे तीन राजपुत्र, तीन नदियाँ ओर भविष्यत्‌ नगरमें ओर ओर संकल्प रचना हुई वैसे ही यह संसार…
  20. Verse 37एकमात्र जलस्वरूप चंचल समुद्र अपने स्वरूपभूत जल में अपने आप स्फुरित होता है वैसे ही एकमात्…
  21. Verse 38पहले परमात्मा से एकमात्र संकल्प उदित हुआ । वही संकल्प जैसे दिन सूर्य के व्यापारो से ओर लो…
  22. Verse 39केवल संकल्प के त्यागमात्र से निर्विकल्प स्वरूप मे स्थिति होती है, ऐसा दर्शीते हुए उपसंहार…