Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
संकल्पमात्रादितरद्विद्यते नेह किंचन ।
संकल्पवशतः किंचिन्न किंचित्किंचिदेव वा ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे निष्पाप
श्रीरामचन्द्रजी, विकल्परूपी जालों से परिपूर्ण यह प्रातिभासिक संसार रचना बंध, मोक्ष आदि
की सैंकड़ों कल्पनाओं के रूप से वृद्धि को प्राप्त होती है ॥३ ३॥
विकल्प संकल्पो के कार्य हैं, यानी संकल्पजनित हैं, अतः संकल्प से पृथक् उनकी सत्ता
नहीं हैं, इस आशय से कहते हैं।
वस्तुतः एकमात्र संकल्प के सिवा यहाँ और कुछ नहीं हे । जो विकल्परूप प्रतीत होता
है, वह सब संकल्प के कारण ही प्रतीत होता है जो विकल्प समूह का भान होता है, वह
कुछ भी नहीं है, अथवा कुछ है, कुछ नहीं है अर्थात् रज्जु सर्प के तुल्य मिथ्या है, कुछ है
यानी भ्रान्ति का आधार चैतन्य है