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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verses 4–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, verses 4–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 4-8

संस्कृत श्लोक

क्वचित्सन्ति महात्मानो राजपुत्रास्त्रयः शुभाः । धार्मिकाः शौर्यमुदिता अत्यन्तासति पत्तने ॥ ४ ॥ विस्तीर्णे शून्यनगरे व्योम्नीव जलतारकाः । द्वौ न जातौ तथैकस्तु गर्भ एव न संस्थितः ॥ ५ ॥ अथात्युत्तमलाभार्थं कदाचित्समवायतः । विबन्धवः खिन्नमुखाः शोकोपहतचेतसः ॥ ६ ॥ ते तस्माच्छून्यनगरान्निर्गता वितताननाः । गगनादिव संश्लिष्टा बुधशुक्रशनैश्चराः ॥ ७ ॥ शिरीषसुकुमाराङ्गाः पृष्ठतोऽर्केण तापिताः । मार्गेऽहनि गता ग्रीष्मतापार्ताः पल्लवा इव ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

थे । उनमें से दो उत्पन्न ही नहीं हुए ओर एकमा के गर्भमें भी स्थित नहीं हुआ । किसी समय, जब कि दुभाग्यवश उनके बन्धु-वान्धव मर गये थे, दुर्भिक्ष आदि से मलिनवदन हुए अपने नागरिकों के समाज से किसी उत्तम दूसरे नगर की प्राप्ति के लिए निकले । जैसे आकाश से परस्पर मिले हुए बुध, शुक्र ओर शनैश्चर निकलते हैं वैसे ही विशाल वदनवाले वे तीनों राजकुमार उस शून्य नगर से निकले | शिरीष के फूल के समान उनके अंग सुकुमार थे, अतएव पीछे से सूर्य के संताप से सन्तप्त हुए वे ग्रीष्म के सन्ताप से सन्तप्त हुए पल्लवो की नाई मार्ग में मुरञ्ञा गये