Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
किमुच्यते मुनिश्रेष्ठ बालकाख्यायिकाक्रमः ।
क्रमेण कथयैतन्मे मनोवर्णनकारणम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त अर्थ मे बालकाख्यायिका की अवतारणा करते हुए श्रीवसिष्टजी उपसंहार
करते हैं ।
हे सुन्दरतम श्रीरामचन्द्रजी, पहले मन हुआ, तत्पश्चात् बन्ध और मोक्षकी दृष्टि हुई,
तदनन्तर प्रपंचकी रचना हुई, जिसका कि भुवन नाम पड़ा इत्यादि यह बन्ध की स्थिति बालक
के लिए धाय से कही गई आख्यायिका के समान बद्धमूल हुई है ॥४ ३॥
सौववाँ सर्ग समाप्त
एक सौ एकवा सर्ग
वस्तुतः अर्थशून्य होती हुई भी संकल्प से सैकड़ों विकल्पवाली सृष्टि का
बालकाख्यायिकारूप दृष्टान्त वर्णन ।
संकल्प-विकल्य रूप मन का संकल्प ही मूल है । संकल्प का निरोध करने पर मूल का
उच्छेद हो जाने के कारण विकल्पों के न उठने पर निर्विकल्प पद में स्थिति प्राप्त होती है, यह
सूचन करने के लिए पूर्व सर्ग मे अवतारित बालकाख्यायिका को सुनने की इच्छा करने वाले
श्रीरामचन्द्रजी पूछते है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ, बालकाख्यायिका का दृष्टान्त लोक में किस प्रकार का
कहा जाता है । मनके वर्णन में कारण रूप उसे आप कृपा कर क्रमशः मुझसे किये