Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verses 14–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 14-16
संस्कृत श्लोक
फलान्यमृतकल्पानि भुक्त्वा पीत्वा च तद्रसम् ।
कृत्वा गुलुच्छकैर्मालां चिरं विश्रम्य ते ययुः ॥ १४ ॥
पुनर्दूरतरं गत्वा मध्याह्ने समुपस्थिते ।
सरित्त्रितयमासेदुस्तरङ्गतरलारवम् ॥ १५ ॥
तत्रैका परिशुष्कैव मनागप्यम्बु न द्वयोः ।
विद्यते सरितोर्दृष्टिरन्धलोचनयोरिव ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
अमृत
के तुल्य सुस्वादु फल खाकर, उनका रस पीकर ओर गुलुच्छ नाम की लताके बौरों से माला
पिरोकर तथा बहुत देर तक वहाँ आराम कर वे वहाँ से चले गये फिर बहुत दूर जाकर मध्याह
होने पर उन्हे तीन नदियाँ मिली, जो लहरों से चंचल ओर मुखरित थी । उनमें एक नदी बिल्कुल
सूखी ही थी और दोमें जैसे अन्धे के नेत्रगोलको में दश्निन्द्रिय नहीं होती हे वैसे ही तनिक भी
जल न था