Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
संप्रविश्योपविश्याशु विहरन्तो वराननाः ।
प्रापुः स्थालीत्रयं तत्र तप्तकाञ्चनकल्पितम् ॥ २३ ॥
तत्र कर्परतां याते द्वे एका चूर्णतां गता ।
जगृहुश्चूर्णरूपां तां स्थालीं ते दीर्घबुद्धयः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त भवन में शीघ्र प्रवेशकर
ओर बैठ कर विहार कर रहे सुन्दर मुख-कमलवाले उन राजकुमारों को तपे हुए सोने से बनी
तीन बटलोहियाँ मिली । उनमें से दो के तो दो टुकड़े हो गये थे ओर एक चूर-चूर हो गई थी ।
उन महाबुद्धियों ने चूर-चूर हुई बटलोही को ग्रहण किया