Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verses 9–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, verses 9–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 9-12
संस्कृत श्लोक
संतप्तमार्गसिकतादग्धपादसरोरुहाः ।
हा तात चेति शोचन्तो मृगा यूथच्युता इव ॥ ९ ॥
दर्भाग्रभिन्नचरणास्तापखिन्नाङ्गसंधयः ।
उल्लङ्घ्य दूरमध्वानं धूलिधूसरमूर्तयः ॥ १० ॥
मञ्जरीजालजटिलं फलपल्लवमालितम् ।
मृगपक्षिगणाधारं प्रापुर्मार्गे तरुत्रयम् ॥ ११ ॥
यस्मिन्वृक्षत्रये वृक्षौ द्वौ न जातौ मनागपि ।
बीजमेव तृतीयस्य स्वारोहस्य न विद्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
खूब तपी हुई मार्ग की बालू से उनके चरणकमल जल गये, अतएव
यूथसे अलग हुए मृगो की नाई हा तात ! आदि कहकर वे शोक कर रहे थे । कुशके अग्र भाग से
उनके चरण विध्ध गये थे । सूर्य के प्रचण्ड ताप से अंगो के सब जोड शिथिल हो गये थे उनका
सर्वाग धूलि से धूसर हो गया था । लम्बे मार्ग को तय कर उन्होने मागमिं फूलों की मंजरियों से
व्याप्त, फल और पल्लवोंसे अलंकृत तथा मृग ओर पक्षियों के निवासभूत तीन पेड पाये ।
जिन तीन वृक्षोमें से दो वृक्ष तो बिलकुल भी उत्पन्न नहीं हुए थे, सुखसे चढ़ने योग्य तीसरे वृक्ष
का बीज भी न था