Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 6
पौँवर्वौ सर्ग समाप्त छठवाँ सर्ग विश्वामित्रजी का आगमन, राजा द्वारा उनका विधिवत् पूजन तथा ऋषि के आगमनजनित हषद्रिक से "जो आप आज्ञा करेंगे उसका मैं विधिवत् पालन करूंगा" - यों प्रतिज्ञा ।
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- Verses 1–7वाल्मीकिजी ने कहा : भरद्वाज, जब मुनिवर वशिष्ठजी के यों कहने पर खेदयुक्त, सन्देहनिमग्न अतए…
- Verses 8–9उनके वचन सुनकर द्वारपाल राजमहल में गये । पूर्वोक्त वाक्य से प्रेरित द्वारपालों ने विलम्ब…
- Verses 10–14महाराज, ड्योढी पर प्रातःकाल के सूर्य के समान तेजस्वी, बड़े प्रभावशाली अग्नि की ज्वाला के…
- Verse 15अनेक राजाओं द्वारा परिवृत्त वसिष्ठ और वामदेवजी के साथ महाराज पैदल ही जहाँ पर विश्वामित्रज…
- Verses 16–25विश्वामित्रजी ब्रह्मवर्चस् से ओर क्षात्र तेज से सुसंपन्न थे । उनके दर्शन से ज्ञात होता थ…
- Verse 26तदनन्तर वसिष्ठ आदि सभी ब्राह्मणों ने स्वागत आदि के क्रम से आदरपूर्वक उनकी पूजा की
- Verse 27महाराज दशरथ ने कहा : भगवन्, जैसे सूर्य अपने तेजोमय दर्शन द्वारा कमल के तालाबों पर अनुग्र…
- Verse 28महर्षे, जो अनादि (कारणरहित), क्षय रहित ओर अविनाशी परम पुरुषार्थरूप सुख है, आपके दर्शनों स…
- Verse 29निस्सन्देह आज हमने पुण्य से धन्य पुरुषों के आगे स्थान प्राप्त कर लिया है, क्योंकि हम लोगो…
- Verses 30–31यों महाराज दशरथ के समान ही कह रहे महर्षि और अन्य राजा सभाभवन में आकर आसनं पर बैठ गये
- Verses 32–33महर्षि के शुभागमन से प्रसन्नवदन महाराज दशरथ ने महर्षि की तपस्यासम्पत्ति (विपुल तप) से भयभ…
- Verse 34राजा दशरथ द्वारा पूजित विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए । उनका मुखकमल खिल उठा । उन्होने राजा…
- Verses 35–37क्षण भर के लिए परस्पर मिलकर ओर यथायोग्य पूजा-सत्कार कर सभीको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे राजम…
- Verses 38–41विधिपूर्वक पूजकर प्रसन्नचित्त पुण्यात्मा राजा ने हाथ जोड़ कर विश्वामित्रजी से ये वाक्य कह…
- Verse 42ब्रह्मन्, स्थलचर मनुष्य आदिको आकाश में उड़ने से जैसा आनन्द होता है, और मृत पुरुष के पुनः…
- Verse 43मुनिवर, ब्रह्मलोक में रहना किसको प्रीतिकर न होगा ? वैसे ही प्रीतिकर आपका आगमन है अर्थात्…
- Verses 44–45भगवन्, आप परम धार्मिक हैं, आपकी क्या अभिलाषा है ? मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? ब्रह्मन् आप…
- Verse 46जैसे गंगाजल के स्नान से मुझे प्रसन्नता होती है, वैसे ही आपके दर्शन से प्रसन्नता हुई हे ।…
- Verse 47पास आये हैं, यह बड़ी आश्चर्य की बात है
- Verse 48हे तत्त्वज्ञशिरोमणे, आपके शुभागमन से मैं निष्पाप हो गया हूँ। अपने को पुण्यक्षेत्र में स्थ…
- Verses 49–50मुने, मुझे प्रतीत हो रहा हे कि आपका शुभागमन साक्षात् ब्रह्म का शुभागमन है आपके आगमन से उ…
- Verse 51यहाँ आये हुए आपके दर्शन कर, पूजा कर और प्रणाम कर, जैसे चन्द्रमा को देखकर समुद्र अपने में…
- Verse 52मुनिवर, आपका जो कार्य हो, जिस प्रयोजन से आप आये हैँ, उसे आप किया ही समझिए, क्योकि आप सर्व…
- Verses 53–54गाधिनन्दन, अपने कार्य के विषय में आप विचार न कीजिए । भगवन्, पात्रभूत आपके लिए मुझे कुछ भ…
- Verse 55आत्मवित् महाराज दशरथ द्वारा विनयपूर्वक कहे गये श्रुतिमधुर सुमिष्ट वचनों को सुनकर प्रख्या…